रविवार, 21 सितंबर 2008

मा और मैं ( The Best Of Mine)

मेरी बूढी हो चुकी मा
हड्डियों का एक ढाँचा भर
जिसमे, आँखें अब कही नहीं

सिर्फ लटकती हुई खालों
और सूखी चमड़ी की झुर्रीयो से
झाँकता हुआ अतीत है, जिसमे
वेदना, संघर्षों, शोक और विषाद के
निरीह, बेबस पन्ने फड़फड़ाते है

यदाकदा, जब मैं
दुनियावी नाकामी से थक कर
उसके आँचल में सर छिपाता हू
तो स्वाभाविक ही
आँसूओ की दो गर्म बूदे
वर्जनाओ को तोड़ती हुई
उसके गालों से होकर
मेरे गालों को चूमती है.

जीवन का पाठ पढ़ाती हुई
उसकी जिन्दगी मुझे सिखाती है-
मुश्किलों से हारना कब जिन्दगी है
इसे तो हर हाल में हमें जीतनी है .

2 टिप्‍पणियां:

Harvinder Singh Harry ने कहा…

Yes, its actually really good. Please keep writing good poems like these. :)

Unknown ने कहा…

really amit best best best hai
dil ko chu gai