रविवार, 21 सितंबर 2008

वक़्त

वक़्त बीतता है, बीतता जाता है
और बीत जाता है बहुत कुछ साथ में
घटना, कहानी या इतिहास
कुछ नहीं रह जाता आदमी के हाथ में

दिन, रात, महीने, साल
गर्मी-सर्दी या बादल-बरसात
जन्म, मृत्यु या ज़िन्दगी की बात
सब खत्म हो जाता है आदमी के बाद में

पुरानी फिल्म की रील में धुन्धले धब्बे सा वक़्त
सच्चाई है तुम्हारी भी हमारी भी
भूख, दर्द, वासना, नाम, स्मृति या खालीपन
सब बुझ जाता है अन्धेरी रात में..........

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