रविवार, 21 सितंबर 2008

रात

रंग सारे बेरंगे इतने
ख़्वाबों की परछाई में
यूँ रात तड़पती प्यासी
तेरे आँचल की गहराई में

तुझ तक कैसे पहुँचू मैं
जीना कैसा तेरे बिन
सुबह प्यासी रातें प्यासी
प्यास है हर बीनाई में

इस जीवन का रंग ढंग सारा
गुमसुम-गुमसुम रहता है
सहमी नींद के सपनों में चुप
बीते रात जगाई में ....

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