तुम में कुछ मुस्कराता हुआ सा लिपटा रहा
और मैं तपती रेत पर चलता रहा
आँखों में इक सपने की अंतिम आहट लिये
मैं चलता रहा और तड़पता रहा
न जाने कौन सी है वह दुनिया जहाँ
रात को भी दिन का पता होता है
इस शहर के दो लमहों के बीच
मैं भटकता रहा और तड़पता रहा ....
मिलने और ना मिलने के बीच
अट्की हुई हमारी जिन्दगी में
न जाने कितनी
सदियों का कारवाँ गुजरता रहा .............
रविवार, 21 सितंबर 2008
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